भारत ने दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी को भारत-स्थित बताने पर संयुक्त राष्ट्र रैपोर्टर के वर्णन को चुनौती दी
न्यूयॉर्क: भारत ने संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें दाऊद इब्राहिम के आपराधिक नेटवर्क, डी-कंपनी, को भारत-स्थित संगठन बताया गया है। बुधवार, 21 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति की बैठक में भारतीय राजनयिक रघू पुरी ने रिपोर्ट में गंभीर तथ्यात्मक गलतियों के रूप में बताई गई बातों पर चिंता जताई और चेताया कि ऐसी गलतियां अंतरराष्ट्रीय संगठन की साख को कमज़ोर कर सकती हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव पुरी, आतंकवाद का मुकाबला करते हुए मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के संवर्धन और संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टर बेन सॉल की रिपोर्ट का जवाब दे रहे थे। भारत ने डी-कंपनी के वर्णन पर सवाल उठाया और तर्क दिया कि दाऊद इब्राहिम के इतिहास और आतंकवाद से कथित संबंधों के अहम ब्योरे पर्याप्त रूप से पेश नहीं किए गए।
इस विवाद ने भारत के उस लंबे समय के रुख की ओर नए सिरे से ध्यान खींचा है कि दाऊद इब्राहिम वांछित भगोड़ा है, जिसके पाकिस्तान में रहने का माना जाता है। यह मुद्दा आतंकवाद, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की सटीकता पर व्यापक कूटनीतिक मतभेदों को भी उजागर करता है।
भारत ने तथ्यात्मक सटीकता पर चिंता जताई
अपने हस्तक्षेप में पुरी ने उन रिपोर्टों के प्रकाशन की आलोचना की जिनमें भारत के मुताबिक तथ्यात्मक गलतियां हैं, और उन्हें तैयार करने वाले विशेषज्ञों की पर्याप्त जवाबदेही नहीं है।
भारत ने तर्क दिया कि उसके नेता की पृष्ठभूमि को पर्याप्त रूप से समझाए बिना डी-कंपनी को भारत-स्थित बताना भ्रामक धारणा बना सकता है। भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, दाऊद इब्राहिम ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 2003 की उस सूची से पहले भारत छोड़ दिया था, जिसने उसे अल-कायदा से जोड़ा था।
पुरी ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध सूची के इतिहास का हवाला दिया और कहा कि रिपोर्ट में 1993 के मुंबई बम धमाकों के सिलसिले में भारत में इब्राहिम की वांछित स्थिति के बारे में ज़्यादा जानकारी शामिल होनी चाहिए थी।
भारत ने ज़ोर दिया कि प्रासंगिक संदर्भ छोड़ देने से रिपोर्ट की सटीकता कमज़ोर हुई। पुरी ने यह भी तर्क दिया कि ऐसी कमियां संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के काम और व्यापक संगठन की साख में भरोसे को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
ये टिप्पणियां भारत सरकार के रुख को दर्शाती हैं। विवाद के पूरे आकलन के लिए रिपोर्ट के सटीक शब्दों, संयुक्त राष्ट्र के संबंधित प्रतिबंध रिकॉर्ड और विशेष रैपोर्टर की किसी प्रतिक्रिया पर विचार करना ज़रूरी है।
दाऊद इब्राहिम पर भारत का रुख
दाऊद इब्राहिम भारतीय भगोड़ा है, जो संगठित अपराध से जुड़ा रहा है और 1993 के मुंबई बम धमाकों समेत गंभीर आपराधिक और आतंकवाद संबंधी मामलों में भारतीय अधिकारियों को वांछित है।
भारत लंबे समय से कहता रहा है कि इब्राहिम पाकिस्तान में रहता है। संयुक्त राष्ट्र की बैठक में पुरी ने 2011 में अमेरिकी अभियान में मारे जाने से पहले पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी का हवाला दिया। यह तुलना भारत के इस दावे को रेखांकित करने के लिए थी कि इब्राहिम भारत के बाहर रहता है।
इब्राहिम का ठिकाना भारत-पाकिस्तान संबंधों में लंबे समय से मुद्दा रहा है। पाकिस्तान पहले वांछित लोगों की अपने क्षेत्र में मौजूदगी के भारतीय आरोपों को खारिज करता रहा है। इसलिए किसी व्यक्ति के मौजूदा ठिकाने के दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित न होने तक संबंधित अधिकारियों के नाम से ही बताना चाहिए।
डी-कंपनी को व्यापक रूप से इब्राहिम से जुड़ा आपराधिक नेटवर्क बताया जाता है। उसकी गतिविधियां और आतंकवाद से कथित संबंध अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चर्चाओं और प्रतिबंध संबंधी रिकॉर्ड में आते रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची का हवाला
पुरी ने खास तौर पर डी-कंपनी से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 2003 की सूची और अल-कायदा से उसके कथित संबंध का ज़िक्र किया। भारत ने तर्क दिया कि रिपोर्ट के वर्णन में इब्राहिम के भारत से जाने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध रिकॉर्ड में उसके बाद के आने का कालक्रम पर्याप्त रूप से नहीं समझाया गया।
सुरक्षा परिषद प्रतिबंध सूचियां रखती है, जिनका मकसद आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं की गतिविधियों और संसाधनों पर रोक लगाना है। ऐसी सूचियों में पहचान संबंधी जानकारी और नामित करने के कारणों का सार होता है।
भारत की आपत्ति यह थी कि रिपोर्ट के शब्दों को पर्याप्त ऐतिहासिक संदर्भ के बिना पढ़ा जा सकता है। सरकार ने कहा कि संतुलित वर्णन के लिए इब्राहिम की वांछित स्थिति और आतंकी गतिविधि से कथित संबंधों के ब्योरे ज़रूरी थे।
यह असहमति अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में सटीक भाषा के महत्व को दिखाती है, खासकर जब वे आपराधिक नेटवर्क, आतंकवाद और संगठनों की भौगोलिक स्थिति पर चर्चा करती हैं।
मानवाधिकार और आतंकवाद-रोधी पर व्यापक असहमति
भारत ने आतंकवाद संबंधी चर्चाओं में मानवाधिकार ढांचों के इस्तेमाल को लेकर भी व्यापक चिंताएं उठाईं। उसके प्रतिनिधि ने तर्क दिया कि मानवाधिकार तंत्रों का इस्तेमाल आतंकवाद, कट्टरपंथ या हिंसक उग्रवाद को सही ठहराने या उसे माफ करने के लिए नहीं होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र का आतंकवाद-रोधी ढांचा सुरक्षा उपायों और मौलिक अधिकारों की रक्षा के बीच संबंध को संबोधित करता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत राज्यों के दायित्वों पर विचार करते हुए अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से आतंकवाद-रोधी नीतियों की जांच की उम्मीद की जाती है।
भारत का हस्तक्षेप सरकार के इस विचार को दर्शाता था कि आतंकवाद पर रिपोर्टिंग सटीक, निष्पक्ष और सीमा-पार हिंसा से प्रभावित देशों के अनुभवों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए। उसने रिपोर्टों में तथ्यात्मक गलतियां होने पर ज़्यादा जवाबदेही की मांग भी की।
आगे क्या होगा?
महासभा की तीसरी समिति में हुआ यह आदान-प्रदान आतंकवाद, मानवाधिकारों और संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की ज़िम्मेदारियों पर जारी अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा है। भारत की आपत्ति ने रिपोर्ट के शब्दों और डी-कंपनी के उसके वर्णन की सटीकता को विवाद के केंद्र में ला दिया है।
आगे की स्पष्टता रिपोर्ट के पूरे पाठ, सुरक्षा परिषद के संबंधित रिकॉर्ड और विशेष रैपोर्टर या संयुक्त राष्ट्र की किसी प्रतिक्रिया पर निर्भर कर सकती है। अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध होने तक, भारत की आलोचना को सरकार के बताए रुख के रूप में पेश किया जाना चाहिए, न कि रिपोर्ट के गलत होने के स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में।
यह घटनाक्रम दाऊद इब्राहिम, डी-कंपनी और सीमा-पार आतंकवाद के आरोपों के आसपास की कूटनीतिक संवेदनशीलता को रेखांकित करता है। यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर रिपोर्टों में पारदर्शी स्रोत और सावधानी से तथ्यों के सत्यापन के महत्व को भी उजागर करता है।


