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आरटीआई से खुलासा: दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय ने नहीं की सीधी कार्रवाई
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आरटीआई से खुलासा: दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय ने नहीं की सीधी कार्रवाई

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आरटीआई से खुलासा: दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय की प्रतिक्रिया सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब से खुलासा हुआ है कि कैबिनेट सचिवालय ने भारत निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर सीधी कार्रवाई शुरू नहीं की।

आरटीआई से खुलासा: दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय की प्रतिक्रिया

सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब से खुलासा हुआ है कि कैबिनेट सचिवालय ने भारत निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर सीधी कार्रवाई शुरू नहीं की। दस्तावेजों से पता चलता है कि अधिकारियों ने इन शिकायतों को आयोग की ओर से औपचारिक संवाद के बजाय आयुक्तों द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से की गई शिकायत माना।

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इन पत्रों में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के आचरण और कार्य-व्यवस्था को लेकर चिंताएं जताई गई थीं। गर्ग भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी हैं, जिन्हें सितंबर 2024 में कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने निर्वाचन आयोग में नियुक्त किया था।

ये ब्योरे पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के बत्रा के आवेदन पर सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जारी रिकॉर्ड से सामने आए। दस्तावेजों से पता चलता है कि कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों पर कैसे विचार किया और उस चरण पर सीधी कार्रवाई न करने का फैसला क्यों किया।

कार्य आवंटन आदेश को लेकर विवाद

मीडिया संस्थानों द्वारा रिपोर्ट किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतें गर्ग द्वारा 28 जुलाई 2026 को जारी एक कार्य आवंटन आदेश से जुड़ी थीं। यह आदेश उन्होंने तब जारी किया था जब प्रशासन प्रभाग संभालने वाले अधिकारी छुट्टी पर थे और उन्होंने इस प्रभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाली थी।

रिपोर्ट के अनुसार, इस आदेश ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और समकक्ष रैंक के अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का आवंटन बदल दिया।

संधू और जोशी ने आरोप लगाया कि ये बदलाव आयोग और संबंधित अधिकारियों से पूर्व चर्चा या उनकी मंजूरी के बिना किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि ये बदलाव परामर्श के बिना ऐसे फैसले न लेने के पहले दिए गए मौखिक और लिखित निर्देशों के बावजूद किए गए।

रिपोर्ट के अनुसार, जोशी ने एक और चिंता जताई कि उन्होंने प्रशासन प्रभाग से जो फाइल मांगी थी, वह उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।

आयुक्तों ने तर्क दिया कि यह प्रक्रिया स्थापित नियमों के अनुरूप नहीं थी और उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के अनुपालन पर सवाल उठाए।

कार्य आवंटन आदेश बाद में निर्वाचन आयोग के भीतर आंतरिक कार्रवाई का विषय बन गया। 26 सितंबर को जारी एक बयान में आयोग ने कहा कि दोनों आयुक्तों के निर्देशों के बाद पुनर्वितरण के आदेश लागू नहीं किए गए।

कैबिनेट सचिवालय ने सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की

कैबिनेट सचिवालय की आंतरिक फाइल नोटिंग से पता चलता है कि अधिकारियों ने तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के दो सदस्यों द्वारा अलग-अलग दी गई शिकायतों पर कार्रवाई के निहितार्थों पर विचार किया।

3 अगस्त की एक नोटिंग में इस मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की राय मांगने का प्रस्ताव दिया गया था। अगले दिन के आकलन में जोर दिया गया कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसे कार्यपालिका के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रूप से काम करना होता है।

नोटिंग में कहा गया कि पत्र आयुक्तों ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से दिए थे और वे पूरे आयोग की ओर से औपचारिक संवाद के बराबर नहीं थे।

अधिकारियों ने माना कि आयोग से आधिकारिक संवाद के बिना कार्रवाई करना एक संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए सचिवालय ने तय किया कि उस चरण पर पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करना और संबंधित कार्यालयों को सूचित करना उचित होगा।

कैबिनेट सचिव ने 5 अगस्त को पत्रों की प्राप्ति स्वीकार की। प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और स्थापना अधिकारी को भेजी गईं।

रिकॉर्ड में यह भी संकेत मिला कि मामले को अधिकारी से जुड़े भविष्य के फैसलों में विचार के लिए फाइल पर रखा जाएगा।

इस तरह जवाब दिखाता है कि शिकायतों की प्राप्ति स्वीकार की गई और उन्हें संबंधित कार्यालयों को भेजा गया, लेकिन उन पत्रों के आधार पर कैबिनेट सचिवालय ने अधिकारी के खिलाफ कोई सीधी कार्रवाई शुरू नहीं की।

सामूहिक निकाय के रूप में निर्वाचन आयोग की भूमिका

भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक प्राधिकरण है, जो संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है।

चुनाव प्रक्रिया में जनता के भरोसे के लिए इसकी स्वतंत्रता केंद्रीय है। आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में काम करता है, और इसके फैसले लागू संवैधानिक प्रावधानों, कानून और स्थापित प्रक्रियाओं से संचालित होते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में बताया गया है कि आयोग अपना कामकाज कैसे करता है। कैबिनेट सचिवालय की नोटिंग में इस सिद्धांत का जिक्र था कि आयोग को जहां तक संभव हो सर्वसम्मति तलाशनी चाहिए, और मतभेद बहुमत से सुलझाए जाने चाहिए।

सचिवालय ने इस संस्थागत ढांचे का सहारा तब लिया जब वह विचार कर रहा था कि क्या उसे आयोग के भीतर काम करने वाले अधिकारी के आचरण से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।

यह मुद्दा किसी एक आयुक्त द्वारा चिंता उठाने और आयोग द्वारा सामूहिक संस्था के रूप में औपचारिक रुख अपनाने के बीच के अंतर को उजागर करता है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के भीतर असहमति से निपटने की उचित प्रक्रिया पर व्यापक सवाल भी उठाता है।

पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल

इस खुलासे ने निर्वाचन आयोग के भीतर प्रशासनिक जवाबदेही और किसी अधिकारी के आचरण पर आयुक्तों के चिंता जताने पर उपलब्ध प्रक्रियाओं की ओर फिर ध्यान खींचा है।

आरटीआई दस्तावेज स्थापित करते हैं कि संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे और सचिवालय ने जवाब तय करने से पहले उनके संवाद पर विचार किया। वे उस चरण पर सीधी कार्रवाई शुरू न करने के लिए अधिकारियों द्वारा बताए गए कारणों की रूपरेखा भी देते हैं।

हालांकि, सीधे कार्रवाई न करने के फैसले को इस निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि गर्ग के खिलाफ आरोप साबित हुए या खारिज हो गए। शिकायतें दोनों आयुक्तों की चिंताओं को दर्शाती थीं, जबकि सचिवालय की प्रतिक्रिया अधिकार-क्षेत्र, संस्थागत स्वतंत्रता और पूरे आयोग की ओर से औपचारिक संवाद के अभाव पर केंद्रित थी।

निर्वाचन आयोग ने अलग से कहा था कि विवादित कार्य पुनर्वितरण आदेश आयुक्तों के निर्देशों के बाद लागू नहीं किए गए। यह घटनाक्रम का एक अहम हिस्सा है और इसे कैबिनेट सचिवालय के फैसले से अलग रखा जाना चाहिए।

इस मामले ने सरकारी निर्णय प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने में सूचना का अधिकार अधिनियम की भूमिका को भी उजागर किया है। आंतरिक फाइल नोटिंग और आधिकारिक पत्राचार हासिल करके आवेदक ने सचिवालय की प्रतिक्रिया के पीछे के तर्क को सार्वजनिक ध्यान में लाया।

आगे क्या होगा

दस्तावेज संकेत देते हैं कि कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों की प्राप्ति स्वीकार की और प्रतियां संबंधित कार्यालयों को भेज दीं, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यालय भी शामिल है। मामले को अधिकारी से जुड़े भविष्य के फैसलों में संभावित विचार के लिए रिकॉर्ड पर भी रखा गया।

उपलब्ध रिपोर्टें यह स्थापित नहीं करतीं कि कैबिनेट सचिवालय ने आरोपों की कोई अलग जांच की। न ही वे गर्ग के खिलाफ कदाचार का कोई अंतिम निष्कर्ष स्थापित करती हैं।

यह प्रकरण उन प्रक्रियागत चुनौतियों को रेखांकित करता है जो तब उत्पन्न हो सकती हैं जब किसी संवैधानिक निकाय के सदस्य किसी अधिकारी के प्रशासनिक फैसलों पर चिंता उठाते हैं। यह व्यक्तिगत शिकायतों, आयोग के सामूहिक फैसलों और सरकार के अन्य कार्यालयों की जिम्मेदारियों के बीच फर्क करने की जरूरत को भी दर्शाता है।

इस खुलासे का व्यापक महत्व उन सवालों में है जो यह संस्थागत स्वतंत्रता, आंतरिक जवाबदेही और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर उठाता है। आगे के घटनाक्रम किसी बाद की आधिकारिक कार्रवाई या निर्वाचन आयोग तथा संबंधित सरकारी विभागों के स्पष्टीकरण पर निर्भर करेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार, इस आदेश ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और समकक्ष रैंक के अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का आवंटन बदल दिया।